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आजादी के गुमनाम आदिवासी नायक : गुमनाम आदिवासी नायकों का भारतीय आजादी में योगदान

500.00 Original price was: ₹500.00.350.00Current price is: ₹350.00.

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Edition :

डॉ. गौरी सिंह परते

978-93-5857-210-0

221

A5

Paperback

Nitya Publications

First

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आजादी के गुमनाम आदिवासी नायक : गुमनाम आदिवासी नायकों का भारतीय आजादी में योगदान

500.00 Original price was: ₹500.00.350.00Current price is: ₹350.00.

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Description

पृकथ्थन

भारत के महान आदिवासी योद्धा एक युगांतकारी आन्दोलन को बड़े पैमाने पर अनदेखा किया गया है। भारत में स्वतंत्रता की लड़ाई पहली बार 1857 में नहीं नड़ी गई थी, किन्तु 1857 में भारत के कई क्षेत्र विदेशियों से स्वतंत्र भी हो गये थे। भारत भूमि पर इस संघर्ष की शुरूआत इससे कई वर्षों पहले हो चुकी थी। पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण और मध्य भारत के समूचे आदिवासी क्षेत्रों में आरम्भ हो चुकी थी, यह लड़ाई वीर आदिवासी नायकों की अगुआई में भारत के आजाद होने तक अनवरत चलती रही। उन्होंने यह लड़ाई पारंपरिक हथियारों, तीर-धनुष और भाला-बरछी, छरी-कटारी और तलवारों से लड़ी गयी थी। भारत माता को पराधीनता से मक्ति दिलाने के दृण संकल्प में अपने प्राणों की आहुति दी। इस आजादी में महिला-पुरूष कन्धे से कन्धे मिलाकर युद्ध किये आजादी के लालच में कई वंश मिट गये तथा कुछ क्षेत्रों में गांव के गांव भी पूरी तरह से काल के गाल में समा गये, फिर भी इसके परवाह किये बिना जब तक इन आदिवासियों के शरीर में श्वांस और प्राण बची रही तब तक दुश्मनों से लड़ते रहे और शहीद हो गये। दुःख की बात तो यह है कि लेखक, कवि, और इतिहासकारांे ने अपनी लेखन के माध्यम से किताबों में कोई स्थान नहीं दिया इसीलिए इनके त्याग और बलिदान की गाथा इतिहासों में गवाह नहीं देती है। आजादी के पूर्व आदिवासी जननायकों ने गांवों और जंगलों के अधिकार को कायम रखने के लिए युगों-युगों तक अपनी आजादी के लिए संघर्ष करते रहे। जब-जब भी काई विदेशी इस भारत भूमि की ऑचल को धूमिल करने की साजिस से आक्रमण कर गुलामी की बेणियों में जगड़ने की कोशिश की तब-तब धरती के बेटा-बेटियों ने अपने खून की लहू-लूहान से सीच कर इस धरती की रक्षा की। विदेशियों ने अपनी संस्कार, संस्कृति एवं अपने शासन इस धरती पर रखने की कोशिश की तब आदिवासियों ने इससे असहमत होकर उनसेे डटकर मुकाबला किया, इन्होंने उनके कोई भी सभ्याता और संस्कृति को कभी भी स्वीकार नहीं किया। ऐसे कई गुमनाम आदिवासी नायक हैं जिन्होंने अपने मातृ भूमि के लिए अजीवन संघर्ष करते हुए हसते-हसते अपने प्राणों की बलिदान दे दिया। भारत को बचाने के लिए जिन आदिवासी जननायकों ने बड़े पैमाने पर अपना योगदान दिया वे महान योद्धा हैं:- अल्लूरी सीताराम राजू वीर बहादुर, बाबूराव फुल्लेसवर शेडमाके, बख्तर साय और मुंडल सिंह, जननायक भागोजी नाईक, रोबिनहुड भीमा नायक, भगवान बिरसा मुंडा, वीर क्रांतिकारी बुद्धु भगत, गोंड राजा डेलन शाह, क्रांतिकारी फूलो एवं झानो, जननायक वीर शहीद गुण्डाधूर, हैपो जादोनांग मलंगमेई, योद्धा हिरदेशाह, क्रांतिकारी जतरा भगत, कोमाराम भीम, राजा प्रवीर चंद्र भंजदेव, वीरांगना रानी अवंतीबाई, वीरांगना महारानी दुर्गावती, क्रान्तिवीर शंम्भूधन फूंगलो, राजा शंकर शाह-रघुनाथ शाह मडावी, वीर बहादुर सिद्धू कान्हू, सिनगी दई, स्वतंत्रता सेनानी बादल भोई, रॉबिन हुड मामा टंट्या भील, क्रांतिकारी वीर तेलगा खड़िय, वीर बहादुर तिलका माँझी, क्रांतिवीर यू कियांग नोंगबा, ऊदा देवी पासी देवी, राजा वेंकटप्पा नायक, शाहिद वीर नारायण सिंह सोना खान, आदि आदिवासी जननायकों ने सबसे पहले आजादी के संघर्ष का बिगुल फूँका था, जिसके कारण 15 अगस्त 1947 को भारत देश अ्रग्रेजी शासन से मुक्त हुआ। इनमें से आदिवासी जननायकों का आजादी की संघर्ष में जितना योगदान रहा शायद उतना अन्यों का योगदान नहीं रहा। फिर भी इतिहास में आदिवासी जननायकों का ठोस सबूत नहीं मिल पा रहा है यह सिर्फ लोगों की बेजुबानी तक ही एक लोकगीत, लोक कथाएॅ, एवं लोक कहानीयॉ अनसुनी बनकर की गूॅज रहीं हैं इनकी शहादत इतिहास में स्थान प्राप्त करने को वर्षाें से संघर्ष करते आ रही हैं न जाने इनकों कभी भी इतिहास के पन्नों में सुरक्षित स्थान मिल पायेगी या नहीं ये ते मैं नहीं जान सकता पर मैं इन महान पराक्रमी योद्धाओं को एक स्वर्णिम स्थान इस पुस्तक के माध्यम से जरूर सर्वाेच्च स्थान प्रदान करते हुए इनकों बारम्बार सेवा जोहार जोहार करता हॅू।

डॉ. गौरी सिंह परते