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RED EYES ( A Painful Journey From UPSC To Life Consciousness ) Part II

300.00 Original price was: ₹300.00.240.00Current price is: ₹240.00.

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योगेंद्र सिंह सोलंकी Yogendra Singh Solanki

978-93-5857-919-2

138

A5

Paperback

Nitya Publications

First

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RED EYES ( A Painful Journey From UPSC To Life Consciousness ) Part II

300.00 Original price was: ₹300.00.240.00Current price is: ₹240.00.

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Description

आज हम जिस दौर में जी रहे हैं, वह अभूतपूर्व परिवर्तन का युग है। यह न केवल दुनिया की तमाम व्यवस्थाओं, मान्यताओं व धारणाओं में; बल्कि तकनीक, नवाचार एवं नवीन प्रयोगों द्वारा जर्ज़र व अप्रासंगिक हो चुकी उन तमाम परंपराओं को तोड़ते हुए कमोबेश हर क्षेत्र में नई व्यवस्था स्थापित करने का भी युग है।

यूँ तो ‘परिवर्तन प्रकृति का नियम है’ और प्रकृति अपने नियमों में सुदृढ़ भी है। परंतु मानव-इतिहास में हज़ारों सालों से चली आ रही सभ्यताओं, संस्कृतियों व परंपराओं के अंतर्गत विकसित जीवन-शैली में समय की माँग अनुसार परिवर्तन कम ही दृष्टिगोचर होते हैं।

यदि परिवर्तन की गति की तुलना में सुधार की गति कम हो जाए तो इंसानी सभ्यता जीवन के कई अति आवश्यक मूल्यों में पीछे छूट जाती है। इसलिए परिवर्तन के इस अभूतपूर्व दौर में जीवन-शैली को भी सुधारने के उसी रफ़्तार के साथ यथोचित प्रयत्न सतत् रूप से हों, उस श्रृंखला में जीवन के एक सबसे महत्वपूर्ण पहलू ‘करियर’ पर विशेष ध्यान केंद्रित करते हुए उसमें वर्षों से लंबित, परंतु अत्यावश्यक नैसर्गिक सुधारों की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास इस उपन्यास में किया गया है।

चूँकि यह एक उद्देश्यपरक उपन्यास है और इसका एक अतिविशिष्ट सुधारोन्मुख उद्देश्य है। अतः इसके उद्देश्य-पूर्ति हेतु इसके लक्षित पाठकों, यथा- छात्रों को कहानी का मर्म भली-भाँति समझने में सहायतार्थ नयी युवा-पीढ़ी की आम-बोलचाल भाषा का प्रयोग अधिकतर भाग में किया गया है। साथ ही आम बोलचाल में अतिप्रयुक्त कुछ अंग्रेजी के शब्दों का भी ‘पर्सुएशन’ के उद्देश्य को सुदृढ़ बनाने हेतु इसकी महत्ता के दृष्टिकोण से एक अच्छे मंतव्य के साथ, भरपूर समावेशन किया गया है। ताकि भाषाई शुद्धता और एकरूपता के दृष्टिकोण से अपरिपक्व उन लक्षित पाठकों तक उन विचारों और उनमें निहित उद्देश्य को सहजता से संचारित किया जा सके।

अतः उक्त उद्देश्य को दृष्टिगत रखते हुए हिंदी व अंग्रेजी का भाषायी उचित अनुपात मिश्रित कर आज के भारतीय परिवेश में हिंदी भाषी क्षेत्रों में आम बातचीत में सर्वाधिक प्रयुक्त होने के साथ-साथ अवचेतन स्तर तक सामान्य हो चुकी बोल-चाल की तथाकथित ‘हिंग्लिश शैली’ का स्वरूप भी कहीं-कहीं परिलक्षित होगा। तो इस हेतु भाषायी विद्वान व हिंदी साहित्य के प्रखर प्रेमियों से इसे इसी रूप में स्वीकार करने का आग्रह है। ताकि भाषाई मर्यादा स्थापित करने की कठोरता में इस उपन्यास की आत्मास्वरूप अंतर्निहित अतिमहत्वपूर्ण उद्देश्य कहीं पीछे न छूट जाए।

विदित है कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर अंतत: हर इंसान के जीवन का परम उद्देश्य जीवन में अनेक प्रयोग करते हुए एक अच्छे और ख़ुशहाल जीवन को ही प्राप्त करना होता है। गौरतलब है कि यूँ तो इस साध्य की प्राप्ति के कई साधन हैं, परंतु जीवन की समग्रता में उन साधनों की दिशा एक ‘उचित करियर’ से होकर ही तय होती है, क्योंकि दिन के 24 घंटे में से 7 घंटे की नींद और भोजन, स्नान आदि दैनिक नित्य क्रियाओं में व्यतीत 10 घंटों के पश्चात शेष 14 घंटों में से करीब 8 से 10 घंटे कम से कम व्यक्ति को अपने करियर या जॉब पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर खर्च करने होते हैं। ऐसे में यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि “किसी का करियर ही उसका जीवन होता है।” यदि व्यक्ति का करियर अच्छा हो, तो उसका दिन भी अच्छा होगा और दिन अच्छा होगा तो जीवन भी अच्छा होगा। यदि व्यक्ति का करियर ही उसके मन का न हो, तो उसे संपूर्ण जीवन ही बेमन से जीने की बाध्यता उत्पन्न हो जाती है। अतः केवल एक बार प्राप्त होने वाले इस महत्वपूर्ण मानव-जीवन में संपूर्ण जीवन की समग्रता में आनुपातिक तौर पर यदि ख़ुशहाल या दुःखी रहने का सबसे बड़ा कारण है- तो वह आपके द्वारा चुना गया या बिगड़ गया ‘करियर’ ही होता है। अतः जीवन में इसकी अतिमहत्ता को ध्यान रखते हुए इस दिशा में आवश्यक कदम उठाए जाएँ और लाखों-करोड़ों युवाओं के करियर को सही दिशा प्राप्त हो सके, ताकि उनका आगे का और समग्र रूप से संपूर्ण जीवन अपेक्षाकृत सुखद हो। केवल जागरूकता और अनुभव के अभाव में उन्हें बिना किसी ग़लती के ही नर्कमय जीवन जीने को मजबूर न होना पड़े, इस महत्वपूर्ण उद्देश्य को केंद्र में रखते हुए इस उपन्यास में एक मार्मिक कहानी और संबंधित आवश्यक तथ्यों के द्वारा इसे भली-भाँति समझाने का प्रयत्न किया गया है।

और इसे पढ़कर निश्चित ही हर उम्र के व्यक्ति को एक सुकून मिलेगा। किसी के ज़ख्मों पर मरहम लगेगा, तो किसी के साथ हुए अन्याय को एक आवाज़ मिलेगी। किसी का जीवन ख़त्म होने से पहले बच सकेगा, तो किसी का जीवन सही उम्र में सँवर सकेगा।

इस उपन्यास की यात्रा शुरू करें, तो अंतिम अंक के पहले न रुकें। क्योंकि अंतिम अंक ही इस उपन्यास का मूल सार है, इसकी आत्मा है व आवश्यक उपसंहार है।

बहरहाल, इस उपन्यास की सबसे अधिक प्रासंगिकता है- उन छात्र-छात्राओं के लिए, जो विद्यालयीन शिक्षा में अध्यनरत हैं और जिनके करियर की दिशा अभी तय नहीं हुई है और जिनका संपूर्ण जीवन, करियर चुनने की उस भेड़-चाल परंपरा की मौत से बच सकता है। अत: जागरूकता से वंचित यही मासूम बच्चे इस उपन्यास के सर्वाधिक लक्षित पाठक हैं।

यूपीएससी की तैयारी करने वाले छात्रों के जीवन पर आधारित यह उपन्यास केवल यूपीएससी तक ही सीमित नहीं है, वरन् मानव जीवन की समस्त विषमताओं को दर्शाने और इसमें आवश्यक सुधार करने हेतु यूपीएससी को इसमें केवल सांकेतिक तौर पर लिया गया है। समग्र रूप में यह एक स्वस्थ व संतुलित जीवन जीने की शिक्षा प्रदान करता है व समाज की सभी बुराइयों को लताड़ता भी है। समाज के हर वर्ग के ‘दोगलेपन’ को नग्न रूप में स्पष्ट करता है और आगे आने वाली पीढ़ियों को सही राह भी दिखाता है।

अतः प्रत्येक व्यक्ति को यह उपन्यास पढ़ना चाहिए। ताकि अपने परिजनों, बच्चों तथा हितैषियों के जीवन में आवश्यक सुधार कर पाने की क्षमता हर व्यक्ति में विकसित हो सके। क्योंकि जीवन में दो ही निर्णय संपूर्ण जीवन की दिशा और दशा को तय करते हैं- ‘ करियर और दूसरा विवाह’।

इसमें पहला ही सबसे महत्वपूर्ण पहलू है, क्योंकि यह दूसरे को भी भली-भाँति प्रभावित करता है।

अतः आज के इस ‘एडवरटाइज़िंग’ और ‘यूट्यूब’ के युग में अपने व्यावसायिक हितों के अंतर्गत ग्राहकों को आकर्षित करने हेतु अपनाई गई नीतियों के तहत करोड़ों छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करते हुए अलग-अलग क्षेत्र के शिक्षा जगत के व्यावसायियों द्वारा अपना साम्राज्य खड़ा करने की होड़ में मासूम बच्चों को परिपक्वता, जानकारी और अनुभव के अभाव में जीवन के भविष्य को तय करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारक- ‘करियर’ के संबंध में ‘दुष्प्रचार कर’ उन्हें मीठी-मीठी बातों के द्वारा अपनी जेबें भरने हेतु आकर्षित किया जाता है। परिणामस्वरूप जागरूकता के अभाव में अनेक छात्रों के जीवन में अपनी क्षमता, रुचि और पृष्ठभूमि का ख्याल किए बिना करियर का ग़लत निर्णय लेकर ज़िंदगी भर के दुःखों को आमंत्रित करने व उनसे जूझते हुए अपनी मूल प्रकृति से विलग जीवन जीकर एकमात्र जीवन के तबाह हो जाने की स्थिति उत्पन्न हो रही है। घर-परिवारों में जागरूकता का अभाव होने और लगातार दुष्प्रचार के स्रोतों से प्रत्यक्षतः प्रभावित होने के सम्मिलित प्रभाव से आगे आने वाले समय में बच्चों के जीवन में ग़लत निर्णय लेकर ऐसी बुरी स्थितियाँ न उत्पन्न हों, इसलिए ऐसी विपरीत स्थितियाँ झेल रहे आज के ‘हर पीड़ित मासूम बच्चे की एक अनकही कहानी’ की मार्मिकता को कुछ काल्पनिक चरित्रों द्वारा तथ्यात्मक व भावनात्मक ढंग से भली-भाँति व्यक्त कर, भावी करोड़ों छात्रों का जीवन तबाह होने व उन्हें ख़ून के आँसू रुलाने वाली परंपरा से बचाने व और उनका जीवन सुखद बनाने का एक छोटा-सा प्रयास है यह उपन्यास, जिसका नाम है- Red Eyes”